नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

20 November, 2014

सुरलहरी ...

शीत का पुनरावर्तन ,
जागृति प्रदायिनी ,
उमगी सुनहली प्रात,.....!!

अलसाई सी ,गुनगुनी धूप ,
गुनगुनाती हुई स्वर लहरियाँ,
शब्दों की धारा सी ...
शांत बहती नदी ...
और ...
 हृदय में अंबर का विस्तार ,
मेरे मन के दोनों किनारों को जोड़ता
एक सशक्त पुल .....
नयनाभिराम सौन्दर्य देते पल...!!

और कुछ शब्दों की माला पिरोता....
गाता मेरा मन ...
आओ री आओ री आली
गूँध गूँध लाओ री ,
फूलन के हरवा ....!!''



10 October, 2014

आज फिर खिलकर, बिखरा पारिजात ....!!


अजस्र सौरभ सहस्त्रधारा ,
लाई वसुंधरा
नवल सौगात !!
मेघ घटाएँ छाई
गगन में
तिरता धवल चंद्रमा,
आई शरद-ऋतु की रात  !!

आज फिर उमगी मंजुल  चंद्रिका ,
बरसे नैसर्गिक आह्लाद ,
उपवन में मेरे
सुरभित दिव्य रास 
 खिलकर निखरा ,बिखरा पारिजात ....!!


03 October, 2014

प्रगाढ़ हरित अवलंब की छत्र छाया में......



इस  विराट वटवृक्ष के   ....
प्रगाढ़ हरित अवलंब  की छत्र छाया में
सत्व पूर्ण एक नीरवता है,
अविच्छिन्न .....!!

हथेलियों पर आक्रोश
ग्रहण करती  हुई,
सायास  प्रकाश बचाने के प्रयास में 
अकंपित अविचलित रहती हूँ मैं
प्रलयकारी  इस वेग में भी .......!!

और इस तरह बचा ले जाती हूँ 
तूफान के बीच भी
अंजुरी में सँजोयी
 वो दिये की लौ
                                        जो अंततः 
उज्ज्वल कर देती है  
हमारा जीवन .......!!

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सभी का जीवन उज्ज्वल प्रकाशमय हो ....विजयदशमी की अनेक शुभकामनायें !!                                                                                   

19 September, 2014

क्षणिकाएं.....!!

रे मन
प्रेम पर  ठहरी हैं
झील  सी गहरी हैं
तोरे मन की बतियाँ ......
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प्रवृत्ति है ये जल की ,
जल  भी
जब कभी नदी सा
कल कल कल कल ....
बह नहीं पाता
तब भी रुका हुआ .....
यह जल ,
सरोवर में,
ठहरा हुआ ,
शब्दों    के  हृदय कमल
  है खिलाता !!

06 September, 2014

तुम्हारे मेरे बीच की कड़ी

तुम्हारे मेरे बीच की कड़ी
सिर्फ एहसास ही नहीं है,
सिर्फ शब्द ही नहीं है,
सिर्फ प्रेम ,ईर्ष्या ,द्वेष या
सिर्फ  आक्रोश  भी नहीं है
बल्कि संकुलता से  परे ,
तुम्हारा वो सशक्त मौन है ,
मेरे चारों तरफ ,
जो तुम्हारे होने का प्रमाण  देता है
अपनी ऊर्जस्वितता में,

और बांधे रखता है सदा ,
दुख सुख में ,
हमे इस अटूट  बंधन में...!!

28 August, 2014

प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

दादुर ,मोर ,पपीहा गायें,
...रुस रुस राग मल्हार सुनायें ,
बूंदों की लड़ियों में रिमझिम ,
गीत खुशी के झूमें आयें

टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!

चलो बाग हिंडोला  झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,
मन मोरा रसधार में भींगे...!!

छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा ,  प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

26 August, 2014

हर साल इसी तरह ....!!


बूंद बरसती ,
भर आह्लाद  ,
अमोघ प्रेम मीमांसा बरसाती ,
धरा पर बूंद बूंद
शब्दातीत भावातीत
श्रवणातीत,
(कहने सुनने से परे)
और लहलहा उठता है प्रेम,
सृष्टि की हरीतिमा में
हरित मन की हर्षित प्रतिमा में
मेरे अंगना में
मेरी बगिया मे ,
मेरी हरी चूड़ियों में,
कुछ तुम्हारे शब्दों  में,
बज उठी हो जैसे बूंदों की ताल,
धिनक धिन
किंकिणी झंकार
जीवंत  है प्रेम
पावन सा ...
पावस ऋतु की वर्षा में भीगा ,
हर वर्ष  इसी तरह ....!!


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बारिश का रास्ता देखते देखते अब ब्लॉग पर ही बारिश डाली है .........शायद ईश्वर दिल्ली में कुछ बरसात भेज दें .....!!