नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

28 August, 2014

प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

दादुर ,मोर ,पपीहा गायें,
...रुस रुस राग मल्हार सुनायें ,
बूंदों की लड़ियों में रिमझिम ,
गीत खुशी के झूमें आयें

टप टप गिरती,झर झर झरतीं
रिमक झिमक पृथ्वी पर पड़तीं
आयीं मन बहलाने लड़ियाँ
जोड़ें जीवन की फिर कड़ियाँ...!!

चलो बाग हिंडोला  झूलें
दिन भर के दुख फिर से भूलें...!!
ऊंची ऊंची लेकर पींगें,
मन मोरा रसधार में भींगे...!!

छम छम पैजनियाँ सी बजतीं
आहा ,  प्रीतिकर झरे प्रतीति !!!!!!

26 August, 2014

हर साल इसी तरह ....!!


बूंद बरसती ,
भर आह्लाद  ,
अमोघ प्रेम मीमांसा बरसाती ,
धरा पर बूंद बूंद
शब्दातीत भावातीत
श्रवणातीत,
(कहने सुनने से परे)
और लहलहा उठता है प्रेम,
सृष्टि की हरीतिमा में
हरित मन की हर्षित प्रतिमा में
मेरे अंगना में
मेरी बगिया मे ,
मेरी हरी चूड़ियों में,
कुछ तुम्हारे शब्दों  में,
बज उठी हो जैसे बूंदों की ताल,
धिनक धिन
किंकिणी झंकार
जीवंत  है प्रेम
पावन सा ...
पावस ऋतु की वर्षा में भीगा ,
हर वर्ष  इसी तरह ....!!


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बारिश का रास्ता देखते देखते अब ब्लॉग पर ही बारिश डाली है .........शायद ईश्वर दिल्ली में कुछ बरसात भेज दें .....!!

22 August, 2014

तपन .....हाइकु ...



तुमरी ठौर....
ढूँढे वही ठिकाना ...
मनवा मेरा ....


तपन बढ़े ...
कैसे दुखवा सहूँ ...
जियरा  जले ...

जलता जल .. .
तपन अविरल  ....
करे श्यामल ....


उड़ता  जल ...
तपिश सूरज की ..
बुझता मन ...


जल जलता ....
जलती भावनाएं ...
सूखती नदी  ..



चाहे मनवा .....
आस घनेरी जैसी  ...
शीतल छाँव ...


मन बांवरा ....
तपन जले जिया ....
मन सांवरा ...

नीरस मन  ...
जलती भावनाएं ....
दग्ध ह्रदय ...


देखो तो कैसी ...
तपती  दुपहरी ....
सूनी हैं  राहें ...........


ए री पवन ...
भर लाई तपन ...
जियरा जले ....



जलता मन ...
मैं क्या करूँ जतन...
जल न पाऊं .....!!

धू धू करती ...
तपती दोपहर ..
चलती हवा ...


18 August, 2014

हे कृष्ण कृष्णा.....!!





हे कृष्ण कृष्णा,
अब दूर करो मेरी तृष्णा,
विभूषित प्रमुदित मन करो,
मन वीणा को स्वरों  का
अलंकार दो,
संवेदना का जीवन में
व्यवहार दो ,
इक बूंद गिरे
और,
मुझ चातक का,
सोया जीवन
 झंकार दो ....!!



16 August, 2014

जीवन में फिर आस जगाओ .....!!

जल जल के जलता है जल
कैसे बीतेंगे ये पल ,
जल बिन निर्जल नैन  हुए ,
नीरस मन के बैन हुए

मेघ घटा आई घन लाई
उमड़ घुमड़ चहुं दिस अब छाई-
बरसो मेघा मत तरसाओ ,
झर झर बुंदियन रस बरसाओ...!!

बूंदों में सुर-ताल मिलाओ ,
राग मियां मल्हार सुनाओ,
जिया की मोरे प्यास बुझाओ,
जीवन में फिर आस जगाओ ....!!

11 July, 2014

धनक की आस बरसाओ ...!!

धनक की आस बरसाओ ,
मेघा बरसो सरसो
धिनक धिन 
बूंदों का ताल सुनाओ ,
धन धन भाग हमरे हो जाएँ 
धरा पर धान का धन बिखराओ 
आ जाओ जीवन हर्षाओ ....!!
मेरी धरा धारण करे धानी धनक ...!!

बेर भई अब ,
मेघा बरसो सरसो
धनक की आस बरसाओ ...!!

04 July, 2014

बरसो रे मेघा बरसो ....!!


बरसो रे  मेघा बरसो ....

धूप घनी ,
और
पीड़ा घनीभूत  होती है जब  ,
जीवन की

तपती दुपहरी में,
छाया भी श्यामल सी
 कुम्हलाती हुई ,

मन उदास करती है जब ,

अतृप्त प्यास से
तृषित है ....
धरणि  का हृदय जब ....
जल की ही आस
जीवित रखती है
हर सांस
तब,

कोयल की कूक में
हुक सी ......
अंतस  से
उठती है एक आवाज़  ...
बिना साज़....

बरसो रे मेघा बरसो ...!!