नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!
नमस्कार ....!!आपका स्वागत है ....!!

24 July, 2015

भोर हो गई ...!!

रात्रि के नीरव एकांत में ,
चाँद रौशन हुआ ,
मन का जब दीप जला,
पथ प्रदर्शित हुआ !!
मन चिन्मयानन्द  हुआ   …!!
बहती हवाओं में ,
फिर मेरा मैं चलता ही रहा ,
वो दीप जलता ही रहा …!!

माँ की दुआओं से ,
मन के अडिग विश्वास से ,
सदाओं का तेल भरता ही गया ,
 असर ऐसा रहा ,
वो दीप जलता ही रहा
मेरा मैं
अपनी राह चलता ही रहा    …
और …
और भोर हो गई ...!!

20 June, 2015

तुझ से ही हूँ मैं .....!!

तुझ से ही हूँ मैं,
तेरे दो आंसू
मेरी वेदना का समुंदर !!
 तेरा हँसना ,
समग्र सृष्टि का होना है !!
आँगन में तेरा होना
समग्र सृष्टि का खिलना है !!
ह्रदय में तेरा होना ही मेरी सम्पूर्णता है !!
हाँ .....तुझ से ही हूँ मैं !!

13 May, 2015

अनुभूति से अभिभूत ....!!


रवींद्रनाथ टैगोर ने भी परमब्रह्म तक पहुँचने के लिए संगीत को ही एकमात्र साधन कहा है --'' संगीत हमारी चित्तवृत्ति को अंतर्मुखी बनाकर हमें आत्मस्वरुप का नैसर्गिक बोध कराता है और आत्मस्वरुप का यह बोध ही मनुष्य को परमतत्व से जोड़ता है।"  

''अनुभूति को अनुभूत  करने में ही उसका अस्तित्व है ''


निसर्ग के इन्ही फूलों में रची बसी,
इन्हीं फूलों से उड़कर,
जो  पहुंचती है मुझ तक,
अनुभूति से अभिभूत ,
उस आमद का करती हूँ स्वागत,
उस सुरभि से ,
जोड़ जोड़ शब्द ,
भरती हूँ कुछ भाव ,
सजती है मेरी कल्पना,
भरती रंग मन अल्पना ,
उठती है  …,चलती है 
और फिर ,
ईश्वर की कृपा बरसती है ,
और....

और ....... 
अनायास नृत्य करती है,

मेरी पंगु कविता .....!!

10 May, 2015

एक माँ को नमन .....

एक माँ को नमन…

जिसकी  मासूम उदास आँखों से भी,
 झांकती है एक हँसी   …!!
वो अभी भी देखती है कुछ ख़ाब,
सूनी सी आँखों में रंग भर देते हैं जो ,
और फिर उसके पौधों का रंग हो उठता है ,
और भी हरा ,
उसके बाग़ की हर क्यारी में होते हैं
फूल ही फूल ,
उसकी कविता में होते हैं
शब्द ही शब्द
उसकी बातों में होते हैं भाव ही भाव ,
उसकी अल्पना में होता है ,
पलाश का रंग .....
इस तरह खिलती है
खिलखिलाती है ...
और फिर से,
उसकी मासूम उदास आँखों में से
झांकती है एक हँसी ...



09 April, 2015

मौन कविता

शब्द बिखरे
निवेदित है आस 
मौन कविता 

दिए की बाती 
तिल तिल जलती 
बुझती जाती


टीस जिया की 
जब कह न सकूँ 
आकुल मन 


द्वार तुम्हारे 
उदास खड़ी  रही 
हंस न सकी 


धूल में लिपटी 
अपने में सिमटी 
ज्यों एक बूँद 

मुस्कान मिटी 
क्यों  मन घबराया 
कोई न आया 

खेल तमाशा 
बन गई आशा 
रैन गंवाई 


05 April, 2015

अनुग्रह मेरा स्वीकार कीजिये .......

यही थे मन के विचार आज से पांच वर्ष पूर्व और आज भी यही है जीवन    …… कितना सुखद लग रहा है आज ,आप सभी के साथ का यह पांच वर्ष का सफर   .... 
अर्थ की अमा 
समर्थ की आभा है ,

अनुग्रह मेरा स्वीकार कीजिये ,
आज दो शब्द अपने ज़रूर मुझे दीजिये    …


मन की सरिता है
भीतर बहुत कुछ 
संजोये हुए ..
 कुछ कंकर ..
कुछ पत्थर-
कुछ सीप कुछ रेत,
कुछ पल शांत स्थिर-निर्वेग ....
तो कुछ पल ..
कल कल कल अति तेज ,
 मन की सरिता है ,



कभी ठहरी ठहरी रुकी रुकी-
निर्मल दिशाहीन सी....!
कभी लहर -लहर लहराती-
चपल -चपल चपला सी.....!!
बलखाती इठलाती .. ...
मौजों का  राग सुनाती ....
मन की सरिता है.

फिर आवेग जो आ जाये ,
गतिशील मन हो जाये -
धारा सी जो बह जाए ,
चल पड़ी -बह चली -
अपनी ही धुन में -
कल -कल सा गीत गाती  ...
राहें नई बनाती ....,    
मन की सरिता है -

लहर -लहर घूम घूम--
नगर- नगर झूम झूम
छल-छल है बहती जाती ..
जीवन संगीत सुनाती -----
मन की सरिता है !!!


…………………………………………। 

अनुग्रहित हूँ ,अभिभूत हूँ 

अनुपम त्रिपाठी 
सुकृती